Tuesday, October 2, 2012

पसमांदा क्रांति अभियान IV




सारांश

  1. पसमांदा क्रांति अभियान भारत में जाति व्यवस्था से उपजी हिकारत  [निरादर] की भावना और सवर्णों द्वारा संचालित पूंजीवाद से उपजी दिल तोड़ देनेवाली गरीबी और सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी का खुल कर विरोध करता है.
  2. हमारा मानना है कि हिंदू समाज की तरह मुस्लिम समाज में भी अशराफ (सवर्ण) मुसलमानो का ही दबदबा है और वह पसमांदा (दलित और पिछड़े) मुसलमानों को गिरी हुई नज़र से देखते हैं.
  3. जहाँ एक ओर अशराफ मुसलमान (सैयद, शेख, मुग़ल, पठान, आदि) अपने आप को दूसरों से अफज़ल (सर्वश्रेष्ट) मानते हैं वहीँ दूसरी ओर कुंजड़ा, धुनिया, कलाल, जोलहा, भटियारा आदि (पसमांदा जातियां) केवल जातियों के नाम नहीं बल्कि मुस्लिम समाज में गालियां या अपमानसूचक शब्द भी बन गए हैं।
  4. इस हिकारत की भावना के साथ-साथ अकलियत राजनीति के नाम पर पसमांदा समाज की सभी हिस्सेदारी मुस्लिम समुदाय की अगड़ी जातियों ने मार रखी है.
  5. हालाँकि पसमांदा मुसलमानों की आबादी मुसलमानों की कुल आबादी का 85 फीसद होती है लेकिन सत्ता मेंचाहे वह न्यायपालिका, कार्यपालिका या विधायिका हो या मुस्लिम कौम के नाम पर चलने वाले तमाम इदारे/संस्थानउनकी नुमाइंदगी न के बराबर है. इसके बरक्स अशराफ मुसलमान, जो मुसलमान आबादी का महज़ 15 फीसद हैं, हर क्षेत्र में उचित से कहीं ज्यादा नुमाइंदगी पक्की करा लेते हैं.
  6. इसलिए मुसलमानों का सवर्ण-अशराफिया तबका मजलूम व महरूम  नहीं बल्कि एक ताकतवर और शोषक तबका है जो अल्पसंख्यक राजनीति के नाम पर सारे मुसलमानों की भीड़ दिखाकर सिर्फ अपना हित साधता है और पसमांदा की बलि चढ़ाता है.
  7. साम्प्रदायिकता के विमर्श का फायदा भी आखिरकार सवर्ण जातियों को ही मिलता है चाहे वह किसी भी धार्मिक समूह के हों. सारे मुसलमान एक हैंया गर्व से कहो हम हिंदू हैंके नारे सवर्ण मुसलमान और हिंदुओं के नारे हैं और इस धार्मिक एकता से दलित-पिछड़ा-पसमांदा तबकों का कुछ फायदा न कभी हुआ है और न कभी होगा.
  8. सारे मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग ग़लत है क्योंकि सारे मुसलमान उपेक्षित (सामाजिक और शैक्षिक तौर पर पिछड़े) नहीं हैं.  जिस तरह सवर्ण हिंदुओं के लिए आरक्षण नहीं हो सकता है उसी तरह सवर्ण मुसलमानों को भी आरक्षण के दायरे में नहीं लाया जा सकता है.
  9. मुसलमानों में सिर्फ दलित और पिछड़े मुसलमानों को ही आरक्षण मिल सकता है.
  10. इस कारण जो पार्टियां सारे मुसलमानों के लिए आरक्षण की वकालत कर रही हैं वह सामाजिक न्याय के उसूलों और संविधान को ताक पर रख कर ऐसा कर रही हैं.
  11. जो पार्टियां ओबीसी कोटे के अंदर पिछड़े मुसलमानों को अलग कोटा देना चाहती हैं वह ओबीसी को धर्म के आधार पर बांटना चाहती हैं. यह सांप्रदायिक दांव है और सारी पार्टियों में मुसलमानों के नाम पर काबिज अशराफिया सलाहकारों के दबाव की वजह से ऐसा हो रहा है.
  12. हम इन दोनों पहलों (सभी मुसलमानों को आरक्षण और ओबीसी मुसलमानों को अलग से आरक्षण) का पुरजोर विरोध करते हैं. हमारा नारा है- दलित-पिछड़ा एक समान, हिंदू हो या मुसलमान !!! दलित-पिछड़ी जातियों, हिंदू हो या मुसलमान, में एकता स्थापित करने से ही हमारे देश में सच्ची धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के हक़ में माहौल तैयार हो सकता है.
पसमांदा क्रांति अभियान खास तौर पर इन मुद्दों पर दबाव और जनमत बनाने का कार्यभार उठाने का एलान करता है: 
  • सारी पार्टियां पसमांदा मुसलमानों को उनकी आबादी के हिसाब से चुनाव में टिकट दें.
  • उत्तर प्रदेश में भी बिहार फार्मूला के अनुसार ओबीसी कोटा में अति-पिछड़ावर्ग के लिए आरक्षण लागू हो और पसमांदा मुसलमानों को अति-पिछड़ा वर्ग में दूसरी हिंदू अति-पिछड़ी जातियों के साथ शामिल किया जाये.
  • दलित मुसलमानों/ईसाइयों को 1950 के राष्ट्रपति आदेश (पैरा 3) को रद्द कर के एससी लिस्ट में शामिल करने हेतु केंद्र सरकार पर उचित दबाव बनाया जाये.
  • भूमंडलीकरण और नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के चलते पसमांदा समाज के कारीगर/दस्तकार/मजदूर तबकों और लघु-उद्योग पर हुए नकारात्मक प्रभाव की ओर ध्यान देकर उचित नीतियां बनायी जायें.
उत्तर प्रदेश की कुछ प्रमुख पसमांदा मुस्लिम बिरादरियां

आतिशबाज़, बावर्ची, बसाती, बंदूकची, भिश्ती, भाण्ड, भटियारा, चिक, चूरिहार, डफाली, दर्ज़ी, धोबी, फकीर, गद्दी, हज्जाम, हलवाई, इराकी/कलाल, खरदी, कुम्हार, लोहार, मिरासी, मोमिन जुलाहा, मंसूरी/धुनिया, मेव, नानबाई, निकारी, पटुआ, कलंदर, कस्साब, राइन/कुंजड़ा, तेली, भंगी, शेख मेहतर, लालबेगी, गोरकन आदि.


लेखक : खालिद अनीस अंसारी और अशोक यादव  
संपर्क: हाशिम पसमांदा (Ph: 09455805768) संयोजक, पसमांदा डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीऍफ़) 

भाग  ३

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